बनारस से हम लोग मडुवाडी-दिल्ली एक्सप्रेस में सवार हुए. हम दोनों की नीचे वाली बर्थ थी. ऊपर वाली दोनों बर्थ खाली थी. टीटीई ने बताया कि वो इलाहाबाद का कोटा है. हम लोग खा-पीकर सो गये.

आधी रात को कोटा पूरा होने का वक्त आ गया. जब हमारी नींद खुली तो दो लोग दिखे. एक आदमी सामान भी रख रहा था – और दूसरे सज्जन के लिए बिस्तर भी लगा रहा था. पर, ये सारा काम वो शख्स बगैर बत्ती जलाए कर रहा था. जो व्यक्ति कुछ नहीं कर रहा था वो स्वीच ऑन करने को कह रहा था. मगर, जो काम कर रहा था उसका कहना था कि जो लोग सो रहे हैं उन्हें तकलीफ होगी. इस पर उसने कहा, “सफर का मतलब कष्ट ही होता है.” दूसरा, भला आदमी, उसकी बात मानने को मजबूर लग रहा था – उसने बत्ती जला दी.
कभी सफर का मतलब कष्ट होता रहा होगा. कई बार आज भी होता है, शायद ऐसे ही लोगों की बदौलत. हाल के एक सर्वे में भी यही बात सामने आई थी.

दवाओं को लेकर भी ऐसी ही धारणा रही होगी – या, काफी हद तक आज भी है. दवाएं कड़वी होती हैं – और उस कड़वे घूंट के बाद आराम मिलता है. बीमारी से निजात मिलती है. इंजेक्शन तो उससे भी तकलीफदेह होता है – उससे पूछिए जिसे इंट्रावेनस इंजेक्शन लेना होता है या फिर जिसे लगातार ड्रिप चढ़वानी होती है. बार बार जगह बदलनी पड़ती है – लिहाजा बार बार वैसी ही तकलीफें सहनी होती हैं.

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डॉ. क्रिश्चियन सैमुअल हैनिमन ने इसे शायद बेहद करीब होकर महसूस किया. फिर उन्होंने इलाज का एक ऐसा तरीका निकाला जिसमें न तो इंट्रा वेनस और न ही किसी और तरीके से इंजेक्शन देने की जरूरत पड़े. चाहे कहीं फोड़ा-फुंसी हुआ हो, या शरीर के किसी हिस्से में कांटा चुभ गया हो – सिर्फ दवाओं की मदद से रोगी को आराम दिलाया जा सके.

हैनिमन ने दवाएं भी ऐसी तैयार की कि हर अगली खुराक का इंतजार रहे. ऐसी मीठी गोलियां कि बड़े तो दवा खाने का इंतजार करें ही – बच्चे भी बिना ना-नुकुर के खा लें.

फिर तो मीठी गोलियों के इस जादूगर के जन्म दिन के मौके पर कुछ मीठा तो होना ही चाहिए. आइए, आज कुछ मीठा हो ही जाए.