आपने ध्यान दिया होगा अक्सर होम्योपैथिक फिजीशियन जर्मन रेमेडीज लेने की सलाह देते हैं. इंडियन दवाएं लेने की बात तब होती है जब महंगी जर्मन दवाएं लेना संभव न हो.
तो क्या इंडियन दवाएं ठीक नहीं होतीं. क्या इंडियन होम्योपैथिक रेमेडीज का असर नहीं होता. आइए एक वाकये से इसे समझने की कोशिश करते हैं.

घर में किसी को कुछ तकलीफ थी. डॉक्टर ने जो दवा बताई संयोगवश घर में ही थी. आधे औंस की एक शीशी में आधी लिक्विड [होम्योपैथी में DILUTION कहते हैं] थी. सादी गोलियां [GLOBULES] भी घर पर ही मिल गईं. हमने शीशी में मीठी गोलियां डाल दीं – और बीमार को खिला भी दिया. दूसरी खुराक तीन घंटे बाद देनी थी.

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जब दूसरी खुराक के लिए शीशी उठाई तो बड़ी हैरानी हुई. शीशी में न तो लिक्विड था, न गोलियां. ऐसा लगा जैसे चीनी की चाशनी भर दी गई हो. माजरा समझ में नहीं आया, इसलिए फिर से डॉक्टर को फोन किया और पूरा मामला बताया.

डॉक्टर ने जो बात बताई वो सुन कर हमें भी ताज्जुब हुआ. डॉक्टर ने बताया कि शीशी में दवा नहीं बल्कि पानी था. होम्योपैथिक दवाएं अल्कोहल [RECTIFIED SPIRIT] में बनाई जाती हैं और उसमें गोलियां जस की तस रहती हैं. चूंकि शीशी में अल्कोहल की जगह पानी था, इसलिए सारी गोलियां गल चुकी थीं.

फिर हमें समझ आया डॉक्टर जर्मन रेमेडीज को ही क्यों लेने की सलाह देते हैं. इस पर मन में सवाल उठा कि क्या इंडियन दवाओं के नाम पर पानी ही बिकता है. हमने डॉक्टर से पूछा.

डॉक्टर ने हमें समझाया कि इंडियन रेमेडीज भी अच्छी हैं – और स्टैंडर्ड तरीके से बनाई जाती हैं. हां, जर्मन में एक्युरेसी की संभावना ज्यादा मानी जाती है. डॉक्टर ने बताया कि जर्मन रेमेडीज के फायदा करने की सबसे बड़ी वजह यही होती है.

इंडियन रेमेडीज भी अच्छी हैं
थोड़े रिसर्च से पता चलता है कि SBL जैसी कंपनियां अच्छी दवाएं तैयार करती हैं. ऐसी और भी कई इंडियन कंपनियां हैं जिनकी दवाएं सही होती हैं. कोलकाता की कई दवा कंपनियां भी प्रामाणिक मानी जाती हैं.

जर्मन कंपनी Willmar Schwabe तो स्थापित ब्रांड है ही. भारत में भी ये कंपनी दवाएं बनाती हैं. WSI यानी Willmar Schwabe India की दवाएं तो अच्छी होने के साथ साथ इम्पोर्टेड दवाओं के मुकाबले सस्ती भी होती हैं. Dr Reckeweg India के प्रोडक्ट तो प्रामाणिक हैं ही.

दवाएं कहां से खरीदें?
ऐसे में स्वाभाविक तौर पर मन में सवाल उठता है कि अगर को जर्मन रेमेडीज खरीदने में समर्थ न हो या फिर कोई खास दवा उपलब्ध न हो तो फिर क्या उपाय है?
उपाय आसान है. पहली कोशिश तो ये हो कि दवा जब भी खरीदें – सीलबंद ही लें. अच्छी तरह से जांच परख कर ही लें.
कुछ दुकानदार भले हेराफेरी करें लेकिन ऐसा तो है नहीं कि सब गलत ही करें. दवा लेने से पहले ये सुनिश्चित कर लें कि दुकान और दुकानदार विश्वसनीय हों. दुकानदार खुली दवा भी सही देते हैं – बस, लेने से पहले परखना जरूरी है.

एक्सपाइरी डेट
एक भ्रम ये भी फैलाया जाता है कि होम्योपैथिक दवाएं एक्सपायर नहीं होतीं. ऐसा नहीं है – दवा लेने से पहले डेट ऑफ मैन्युफैक्चरिंग और बेस्ट बिफोर जरूर पढ़ लें.

थोड़ा ध्यान रखा जाए तो जर्मन रेमेडीज लेने की शर्त जरूरी नहीं होगी. इंडियन रेमेडीज भी उतना ही फायदा करती हैं, जितनी की जर्मन दवाएं.