अगर दाग लगने से कुछ अच्छा हो तो – किसी को दिक्कत क्या है? ‘दाग अच्छे हैं’ – कहने में बुराई क्या है? भले ही ये एक प्रोडक्ट बेचने के लिए स्लोगन हो, लेकिन बात में तो वाकई दम है. इस दुनिया में तो कुछ ऐसी चीजें भी हैं जिन्हें आवश्यक बुराई मानते हुए भी खुले मन से स्वीकार किया जाता है.

होम्योपैथी के को लेकर दुनिया भर में रिसर्च चलते रहते हैं. इन रिसर्च में से ज्यादातर के नतीजे होम्योपैथी के खिलाफ ही देखने को मिलते हैं. शायद किसी चीज का निरंतर विरोध भी कुछ लोगों की दुकान चलाने में मददगार साबित होता है. मेनस्ट्रीम राजनीति की तरह ये काफी हद तक एक प्रकार से विपक्ष जैसी विरोध की राजनीति की ही श्रेणी में रखा जाना चाहिए.

आपने उस दंपती का किस्सा जरूर सुना होगा. दोनों सिनेमा हाल में थे. अचानक पत्नी का सिरदर्द करने लगा. पति ने कहा और कुछ तो नहीं सिर्फ एक टैबलेट है ट्राय कर लो. पति ने हिदायत दी कि टैबलेट को घोंटना नहीं बस मुहं में रखे रहना होगा. पत्नी मान गई. टैबलेट देने के कुछ देर बाद पति ने तबीयत पूछी. पत्नी ने बताया काफी आराम है. थोड़ी देर बाद पत्नी ने बताया कि दर्द बिलकुल ठीक है. पति ने कहा ठीक हो गया फिर भी दवा लिये रहो. मूवी खत्म हो गई. सिनेमा हाल से दोनों बाहर निकले. पति ने पत्नी से दवा थूक देने को कहा. पत्नी ने थूका तो देखा दवा कुछ और नहीं बल्कि पति की शर्ट का बटन था.

बीमारियों के इलाज की उस रहस्यमय दुनिया में इसे प्लेसिबो इफेक्ट (PLACEBO EFFECT) कहा जाता है. दुनिया भर में डॉक्टर अपने मरीजों को प्लेसिबो देते हैं – और ज्यादातर मामलो में उन्हें कामयाबी भी मिलती है.

होम्योपैथी में भी प्लेसिबो का इस्तेमाल होता है. होम्योपैथी के विरोध की राजनीति करने वालों को बाकियों के प्लेसिबो के इस्तेमाल से तो कोई एतराज नहीं है. लेकिन होम्योपैथी में भी ऐसा होता है ये उन्हें हजम नहीं होता.

अभी एक रिसर्च में दावा किया गया है कि 68 हेल्थ कंडीशनंस में से किसी भी में कंवीन्सिंग रिजल्ट देखने को नहीं मिले जिससे साबित हो कि होम्योपैथिक दवाओं का कोई फायदा होता है. इसी क्रम में उनका कहना है कि होम्योपैथिक दवाओं कई तरह के सब्स्टेंस को पानी में बहुत ज्यादा डायल्यूट कर तैयार की जाती हैं. इन शोधकर्ताओं के दावे के अनुसार होम्योपैथिक रेमेडीज में पानी के अलावा कुछ होता ही नहीं.

समझ में नहीं आता इतने बड़े स्तर पर होने वाले रिसर्च में उन्हें ये भी मालूम नहीं होता कि दवाएं पानी नहीं बल्कि एल्कोहल में बनती हैं. इन दवाओं को सेवन के समय मीठी गोलियों या पानी में मिलाया जाता है. हां, मदर टिंक्चर को पानी में मिला कर लिया जाता है, जबकि उन्हें भी एल्कोहल में ही तैयार किया जाता है.

ऐसे रिसर्चों को लेकर रिपोर्टों पर गौर करें तो पता चलता है कि एक दिन एक दवा को बताया जाता है कि लिवर के लिए नुकसानदेह है. दूसरे दिन नये रिसर्च में उसी दवा को हर तरह से सेफ होने का दावा किया जाता है. दोनों ही रिसर्च एक्सपर्ट द्वारा किये गये होते हैं. किसी पर भी सवाल उठाने का मतलब नहीं बनता. लेकिन दोनों रिसर्च अलग अलग मकसद से किये गये ये तो समझ आ ही जाता है.

मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक तो प्लेसिबो का खुल कर इस्तेमाल करते हैं. सही भी है – अगर इससे रोगी को आराम मिल जाए तो दिक्कत क्या है. आखिर असल मकसद तो रोगी को राहत पहुंचाना ही है. कहने का मतलब – जब दाग अच्छे हो सकते हैं तो होम्योपैथी में क्या दिक्कत है?

अगर होम्योपैथिक दवाओं में प्लेसिबो के सिवा कुछ नहीं होता तो जानवरों की बीमारियां कैसे ठीक हो जा रही हैं? क्या उन पर भी इन दवाइयों का मनोवैज्ञानिक असर होता है? बेहतर होता भारत के ग्रामीण इलाकों में पहुंच कर भी कुछ रिसर्च किये जाते और दूध का दूध पानी का पानी हो जाता.

चेतावनी/CAUTION: कृपया योग्य डॉक्टर की सलाह के बगैर कोई दवा न लें. ऐसा करना सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

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