इंटरनेट की दुनिया में गूगल के बिना एक कदम भी चलना मुश्किल है. कहीं से कुछ भी खोज कर लाना हो – गूगल है ना. होम्योपैथी में भी ऐसी ही एक दवा है साइलिसिया जो गूगल की तरह काम करती है.

वैसे तो साइलिसिया कई सारी बीमारियों के इलाज में कारगर साबित होती है, लेकिन इसकी एक बहुत बड़ी खासियत है कि ये दुश्मन को पनाह नहीं लेने देती. जो रोगी साइलिसिया का सेवन करता है ये दवा उसके दुश्मन (foreign bodies) की सबसे बड़ी दुश्मन (deterent) बन जाती है.

मान लीजिए किसी को शरीर के किसी अंग में कांटा चुभ जाए. उसे निकालने की कोशिश की जाए और वो बाहर निकलने की बजाए और अंदर चला जाए. इतना अंदर की बगैर सर्जरी के उसे बाहर निकालना मुनासिब न हो.

अगर कोई अपनी ये तकलीफ किसी परिचित या दोस्त से शेयर करे तो उसके रोंगटे खड़े हो जाएंगे. यही बात अगर वो व्यक्ति किसी होम्योपैथ से शेयर करे तो उसका चेहरा आत्मविश्वास से भरपूर नजर आने लगेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि डॉक्टर को पता है इस समस्या से निजात के लिए सिर्फ एक ही दवा काफी है – साइलिसिया.

तकलीफ सुनने के बाद डॉक्टर कुछ और लक्षण वेरीफाई करने के लिए भूख, प्यास, पसंद-नापसंद पूछेगा. संभव है अगर इलाज के पैमाने में साइलिसिया पूरी तरह फिट न हो तो वो किसी दूसरी दवा की मदद ले. हो सकता है कोई और दवा देने के बाद साइलिसिया दे या पहले साइलिसिया देने के बाद कोई कॉम्प्लीमेंट्री रेमेडी लेने की सलाह दे.

अब अगर डॉक्टर ने कांटा निकालने का काम साइलिसिया को असाइन कर दिया तो किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है. साइलिसिया पूरी मुस्तैदी से ड्यूटी संभालते हुए कांटे की तलाश में निकल पड़ेगी. जितना जल्दी संभव हो उसे खोज कर शरीर से बाहर खदेड़ कर ही खुद सांस लेगी और चैन से बैठेगी.

केस स्टडीज देखें तो कई बार तो साइलिसिया गूगल को भी पीछे छोड़ती नजर आएगी – बशर्ते, साइलिसिया और रोगी के ज्यादातर लक्षण मैच कर रहे हों.