एक आम मिसाल है – जहां सूई की जरूरत हो वहां तलवार काम नहीं आता और जहां तलवार की जरूरत हो वहां सूई काम नहीं आती. यानी, हर मामले में एक ही नुस्खा काम नहीं आ सकता. इलाज के मामले में भी वही बात लागू होती है.
थ्योरी तो ये कहती है कि होम्योपैथी में हर मरीज के इलाज का इंतजाम है, लेकिन प्रैक्टिस में प्रक्रिया अव्यावहारिक लगने लगती है.
सभी को – चाहे वो डॉक्टर हों या मरीज – ये स्वीकार कर लेना चाहिए कि होम्योपैथी की भी अपनी एक सीमा है – और उससे आगे जाना उसके वश की बात नहीं. इसमें सबसे बड़ी बाधा वो थ्योरी है जिसके आधार पर होम्योपैथी की प्रैक्टिस शुरू होती है.

थ्योरी
होम्योपैथी की खोज जिस समानता की थ्योरी पर हुई उसकी कुछ अपनी सीमाएं हैं. इसके तहत होम्योपैथिक रेमेडीज रोगी के शरीर में एक छद्म रोग की अवस्था (जब रोग बढ़ा हुआ या घटा हुआ प्रतीत होता है) पैदा कर देती है जिसके प्रभाव से असल रोग का प्रभाव खत्म हो जाता है. कुछ देर बाद छद्म रोग की अवस्था भी खत्म हो जाती है – और दवा लेने वाला निरोग हो जाता है.
इस प्रक्रिया में रोग बढ़ जाता है – भले ही ये कुछ देर का ही मामला क्यों न हो.

बुखार में
मान लीजिए किसी को बुखार है. होम्योपैथिक फिजिशियन बुखार के लक्षणों के हिसाब से उसे दवा देगा. दवा लेने के बाद उसके प्रभाव से पहले से बुखार के जो लक्षण होंगे वे बढ़ जाएंगे. फिर जाकर बुखार ठीक होगा.
अनुभवी होम्योपैथ इसके लिए कम पोटेंसी और बायोकेमिक दवाओं और कोल्ड पैक की मदद से रास्ता निकाल लेते हैं. रोगी को ऐसी स्थिति में भी होम्योपैथी से आराम मिल जाता है.

चर्म रोगों में
बुखार की ही तरह चर्म रोगों में भी वैसी ही हालत होती है. दवा लेने पर बीमारी बढ़ने लगती है. जब कोई पहले से ही चर्म रोग से परेशान है और दवा लेने के बाद उसकी तकलीफ और बढ़ जाए फिर उसका क्या हाल होगा, समझा जा सकता है.

ऐसी स्थितियों में होम्योपैथिक इलाज इतना मुश्किल होता है कि मरीज परेशान होने लगता है. मरीज के परेशान होने से खुद उसका और डॉक्टर का भी धैर्य जवाब देने लगता है. हालांकि, डॉक्टर मरीज को पहले ही समझा चुका होता है कि पहले रोग बढ़ेगा, फिर धीरे धीरे घटेगा और आखिर में बीमारी से पूरी तरह निजात मिलेगी.
ऐसी स्थितियों में इलाज के दूसरे तरीके अपनाए जाने चाहिए. आखिर फ्रैक्चर होने की स्थिति में या फिर सर्जरी की जरूरत होने पर ऐसा करना पड़ता है कि नहीं. फिर बुखार, चर्म रोग या ऐसी बीमारियों में इलाज के दूसरे तरीके अपनाए जाने में हर्ज क्या है? होलिस्टिक हीलिंग का मतलब भी तो यही होता है.

कोई चीज अपने आप में आइडियल नहीं होती. होम्योपैथिक प्रैक्टिशनरों को भी ये बात समझनी होगी नहीं तो वे अपना तो नुकसान करेंगे ही – होम्योपैथी का तो भट्ठा ही बैठा देंगे. उन्हें हर हाल में इस बात का ख्याल रखना होगा कि मरीज को सबसे पहले तकलीफ से राहत मिलनी चाहिए. इस भागदौड़ भरी जिंदगी में किसी के पास इतना वक्त कहां है कि लंबे समय तक वो सारे काम छोड़ कर सिर्फ इलाज कराए.
दरअसल, होम्योपैथी में शुरुआती अनुसंधानों के बाद कोई खास प्रगति नहीं हुई. बाद में कुछ डॉक्टरों ने कोशिश भी की तो उनका स्तर कभी उच्च कोटि का नहीं रहा. बाकी समय वे होम्योपैथी पर उठने वाले सवालों का जवाब देने में लगे रहे.

अगर वाकई कोई होम्योपैथी का हितैषी होने का दावा करता है तो उसे इस फील्ड में नये रिसर्च और एकस्पेरिमेंट के लिए आगे आना होगा – और दूसरों को भी इस बात के लिए प्रेरित करना होगा.