दावा करने वाले तो होमोसेक्सुअलिटी के इलाज का भी दावा करते हैं. क्या आधुनिक चिकित्सा पद्धति होमोसेक्सुअलिटी को बीमारी मानती है?
इलाज की बात ये है कि होम्योपैथी कैंसर को किस नजरिये से देखती है. इलाज के अत्याधुनिक तरीके के पास सबसे बड़ा हथियार सर्जरी है – जो चीज जरूरत की नहीं या जिंदगी को नुकसान पहुंचाने वाली है उसे काट कर फेंक दो. अब वो पत्थरों से भरा गॉल ब्लैडर हो या कोई ट्यूमर – या फिर सेप्टिक के खतरे की स्थिति में हाथ-पांव या शरीर का कोई दूसरा अंग ही क्यों न हो. सिर को भी तभी तक बख्श दे रहे हैं जब तक कि लैब में आर्टिफिशियल ब्रेन को डेवलप नहीं किया जा रहा.
सवाल ये उठता है कि कैंसर का होम्योपैथी में इलाज है या नहीं? इस मामले में किसी जल्द किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले इस बात को ठीक से समझना होगा.

एक बुजुर्ग का केस
कोलकाता का एक वाकया है, तब जब इसे कैलकटा बोलने का प्रचलन रहा. एक बुजुर्ग जिनकी उम्र 80 साल के आस पास रही उन्हें प्रोस्टेट ग्लैंड की तकलीफ रही. डॉक्टर ने सर्जरी की सलाह दी.
जब ऑपरेशन थियेटर के लिए जाने लगे तो उन्होंने सर्जन से पूछा, “क्या इस ऑपरेशन में मेरी मौत भी हो सकती है?”
हर सर्जन की तरह उसका भी जवाब रहा, “चांसेज कम होते हैं लेकिन निश्चित रूप से कुछ कैसे कहा जाता है. रिस्क तो रहता ही है.”
ये सुन कर उन्होंने घर लौटने का फैसला किया. घर वालों ने समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वो किसी की एक न सुने. एक ही जवाब देते, “इस उम्र में चीरफाड़ के बाद भी जब मौत हो सकती तो उससे बेहतर तो ऐसे ही मर जाना ठीक है.”
काफी दिन से उन्हें कैथेटर लगाया गया था. अब हाल ये हो गया था कि कैथेटर से भी पेशाब कई कई दिन नहीं उतर रही थी. इसीलिए सर्जरी की नौबत आ पड़ी थी.
जब घर लौटे तो सलाह देने वालों की भीड़ जुटने लगी. हर कोई दो-तीन सलाह या इलाज के तरीके तो बता ही देता. उन्हीं में से किसी ने शहर के ही एक डॉक्टर से मिलने की सलाह दी. वो डॉक्टर कोलकाता के ही होम्योपैथिक मेडिकल कालेज में प्रोफेसर थे.
डॉक्टर के पास पहुंचे तो उन्होंने तकलीफ पूछी. बुजुर्ग ने बताया कि कैथेटर लगा हुआ है. तब भी पेशाब नहीं उतरती. कई कई दिन बीत जाते हैं इंतजार में.
“आपको तकलीफ क्या है,” ये सब सुनने के बाद डॉक्टर ने फिर वही सवाल किया. बुजुर्ग चुप रहे तो डॉक्टर ने खास सवाल किये, “जो आपने बताया वो मैंने सुन लिया. अब मैं जानना चाहता हूं इससे आपको तकलीफ क्या है. मतलब – कहीं दर्द है, जलन हो रही है, सिर में चक्कर आ रहा है, नींद नहीं आ रही है.”
“ऐसा तो कुछ भी नहीं है. ऐसी कोई तकलीफ नहीं है. कहीं कोई दर्द या जलन नहीं है. बस, पेशाब नहीं उतरती, कैथेटर लगा हुआ है. बस.”
“बस इतना ही,” डॉक्टर ने दोबारा कंफर्म किया और कहा, “ये कैथेटर उतार दीजिए.”
इस पर बुजुर्ग चौंके तो डॉक्टर ने समझाया कि जब कैथेटर से भी पेशाब नहीं उतर रही तो इसे लगाये रखने से क्या फायदा? बुजुर्ग ने डॉक्टर की बात मान ली और कैथेटर निकाल दिया.
इसके बाद डॉक्टर ने कुछ देर के अंतराल पर तीन चार खुराक दवाएं खिलाईं और घर जाने की सलाह दी ये कहते हुए कि कुछ देर में पेशाब हो जाएगी. न तो बुजुर्ग को और न ही घर वालों को किसी को भी डॉक्टर की बात पर यकीन नहीं हो रहा था.
इतना ही नहीं, प्रोफेसर साहब जब मेडिकल कॉलेज में ये केस डिस्कस कर रहे थे तो छात्र तो छात्र, स्टाफ के दूसरे सहयोगियों को भी उनकी बात गले नहीं उतर रही थी.

बीमारी से दवा का क्या रिश्ता
दरअसल, प्रोफेसर ने बुजुर्ग को जो दवा दी उसमें पेशाब उतरने या प्रोस्टेट की बीमारी का कोई जिक्र ही नहीं है.
क्या थी वो दवा?
उस दवा का नाम है – ओपियम.
फिर प्रोफेसर साहब ने बुजुर्ग को ये दवा क्यों दी इसका तर्क पेश किया.
मैटेरिया मेडिका में कहा गया है – रोगी किसी ऐसी स्थिति से गुजर रहा हो जिसमें जान तक जाने का खतरा हो, लेकिन उसे कोई तकलीफ न हो. यहां तक कि उसे ऐसा भी न लगता हो कि वो बीमार है.
बुजर्ग के लिए ओपियम दवा चुनने के फैसले के पीछे यही आधार था. अब इलाज के किसी सिस्टम में उस बुजुर्ग की जैसे भी डायग्नोसिस हो और जो भी बीमारी का नाम दिया जाये, ये उस डॉक्टर पर निर्भर करता है कि वो किस पद्धति से इलाज करता है.

होम्योपैथी और मोचीराम फिलॉसफी
होम्योपैथी के संस्थापक डॉ. हैनिमन की फिलॉसफी को धूमिल की एक कविता के जरिये समझा जा सकता है. जाने माने जनवादी कवि धूमिल की एक मशहूर कविता है – मोचीराम.
धूमिल ने इस कविता में मोची के मन की बात का जिक्र है. इन पंक्तियों से समझ आता है कि धूमिल का किरदार मोचीराम अपने प्रोफेशन के प्रति कितना कमिटेड है.

“बाबूजी साफ कहूं तो मेरी नजर में
न कोई छोटा है न कोई बड़ा है
मेरी नजर में हर आदमी
एक जोड़ी जूता है
जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है.”

धूमिल से कई साल पहले डॉक्टर सैमुअल हैनिमन ने होम्योपैथिक इलाज के लिए ऐसी ही फिलॉसफी दी थी. हैनिमन ने ‘ऑर्गेनन ऑफ मेडिसिन’ में बार बार इस बात को दोहराया है कि होम्योपैथिक प्रैक्टिशर को हमेशा बीमार की तकलीफों पर ध्यान देना चाहिए – न कि आमतौर पर प्रचलित बीमारी पर.
अगर हैनिमन के हिसाब से इलाज होम्योपैथिक प्रैक्टिशनर इलाज करें तो शायद ऐसी बहसों में उलझने की शायद जरूरत ही न पड़े.
होम्योपैथी में कैंसर का इलाज है? होम्योपैथी में एड्स का इलाज है? होम्योपैथी में टीबी का इलाज है?

हर सवाल का एक ही जवाब है – हर मरीज का इलाज है, एक कुशल होम्योपैथ को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके सामने जो मरीज है उसके मर्ज को कोई और कौन क्या नाम देता है?

चेतावनी/CAUTION: कृपया योग्य डॉक्टर की सलाह के बगैर कोई दवा न लें. ऐसा करना सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

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