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Posts for Category : इमरजेंसी

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चक्कर आने की कई वजहें हैं, ये होम्योपैथिक दवाएं ली जा सकती है

कई बार इसकी वजह कमजोरी होती है तो कभी पेट की गड़बड़ी भी हो सकती है. उल्टी और दस्त होने के बाद भी चक्कर आ सकता है – और वैसी स्थिति में ध्यान देने की जरूरत होती है. ऐसा होने पर सबसे पहले तो पानी और उसके बाद नींबू, नमक और चीनी का घोल लिया जा सकता है.

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FAQ – 013 : Eczema का होम्योपैथी में क्या इलाज है? राहत नहीं, छुटकारा पाने का उपाय बताइए

जब किसी होम्योपैथ को ये पता करना होता है कि किसी बीमारी की असल वजह Eczema है तो वो मरीज को कुछ खास दवाएं देता है. उन दवाओं के असर से शरीर के अंदर छिपा हुआ Eczema बाहर आ जाता है.


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वेट लॉस का बेस्ट फॉर्मूला – मीठी गोलियां और भर पेट भोजन – बस और कुछ नहीं

संभावित दवाएं – अगर वजन सामान्य से ज्यादा है तो वो किसी बीमारी की वजह से हो सकता है. अगर सामान्य से कम है तो भी किसी न किसी रोग की वजह से ही होगा. इसलिए जरूरी है कि उस खास रोग के लिए उपाय किये जाएं – बाकी समस्या अपनेआप खत्म हो जाएगी.


ऐसे करें अपने लिए एक अच्छे होम्योपैथिक डॉक्टर की तलाश

क्वालिफाइड क्यों?
अगर नहीं तो क्या आप किसी भी ऐरे गैरे से अपनी आंख या किसी और अंग की सर्जरी करा लेंगे? नहीं ना. अगर नहीं तो फिर ऐसे ही किसी शौकिया व्यक्ति से दवा क्यों लेना चाहिये?
क्वालिफाइड से मतलब है कि उसने होम्योपैथिक इलाज की प्रोफेशनल ट्रेनिंग ली हो. उसे पता हो कि शरीर में कौन अंग कहां है –

आखिर होम्योपैथी को ज्योतिष और तंत्र-मंत्र जैसा ट्रीटमेंट क्यों मिलता है?

क्या कभी सुना है कि मॉडर्न मेडिसिन देते वक्त कोई डॉक्टर पैरासिटामॉल देने के बाद भी कहे कि इससे बुखार उतर सकता है. या इसे लेने के बाद बुखार उतरने की पूरी संभावना है. नहीं, वो साफ तौर पर कहता है कि इससे बुखार उतर जाएगा.


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FAQ – 008 : क्या एलोपैथिक दवाओं (Modern Medicines) के साथ होम्योपैथिक दवाएं ली जा सकती हैं?

हैनिमन के सिद्धांतों के अनुसार एक मरीज के लिए सिर्फ एक दवा ही बेस्ट होती है, बल्कि कहें तो सही होती है. ये बात पोटेंसी फॉर्म की दवाओं पर ही लागू होती है क्योंकि कई मदर टिंक्चर एक साथ मिला कर भी दिये जा सकते हैं.


क्या होम्योपैथी में कैंसर, टीबी, HIV/एड्स का कोई कारगर इलाज है?

कोलकाता का एक वाकया है, तब जब इसे कैलकटा बोलने का प्रचलन रहा. एक बुजुर्ग जिनकी उम्र 80 साल के आस पास रही उन्हें प्रोस्टेट ग्लैंड की तकलीफ रही. डॉक्टर ने सर्जरी की सलाह दी.
जब ऑपरेशन थियेटर के लिए जाने लगे तो उन्होंने सर्जन से पूछा, “क्या इस ऑपरेशन में मेरी मौत भी हो सकती है?”

FAQ – 007 : होम्योपैथिक दवाइयां जड़ी-बूटियों से ही बनती हैं या केमिकल से भी?

होम्योपैथिक दवाओं के सोर्स भी बड़े दिलचस्प हैं. इनके स्रोत पेड़-पौधे और केमिकल तो हैं ही, ये दवाएं सांप के विष से लेकर टीबी के मवाद तक से बनाई जाती हैं.


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हर चीज की तरह होम्योपैथी को भी अपनी हद है, अपनी ही थ्योरी के कारण

होम्योपैथी की खोज जिस समानता की थ्योरी पर हुई उसकी कुछ अपनी सीमाएं हैं. इसके तहत होम्योपैथिक रेमेडीज रोगी के शरीर में एक छद्म रोग की अवस्था (जब रोग बढ़ा हुआ या घटा हुआ प्रतीत होता है) पैदा कर देती है जिसके प्रभाव से असल रोग का प्रभाव खत्म हो जाता है. कुछ देर बाद छद्म रोग की अवस्था भी खत्म हो जाती है –

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क्या होम्योपैथी लोगों की आस्था की मोहताज है?

किसी भी मरीज या उसके परिवार वालों का हक है कि वो जानें कि इलाज क्या चल रहा है. जो दवा उसे दी जा रही है उसका नाम क्या है. उस दवा का उस पर क्या असर पड़ेगा. क्या उस दवा का कोई साइड इफेक्ट भी है?


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FAQ – 004 : होम्योपैथिक दवाओं की एक बार में कितनी गोलियां लेनी चाहिए?

कितनी गोलियां लेना है ये तो मेडिकल स्टोर वाले से भी पूछा जा सकता है, लेकिन दवा की दूसरी बार और उसके बाद कब लेनी है इसमें तो डॉक्टर की ही सलाह माननी चाहिए.


हर मर्ज का तो नहीं लेकिन हर मरीज का इलाज जरूर है होम्योपैथी में

ऐसे बहुत लोग मिलते हैं जो होम्योपैथी को बताते तो अच्छा हैं, पर उसी वक्त पूछते हैं – फलां बीमारी का इलाज है होम्योपैथी में?
निश्चित रूप से होम्योपैथी में इलाज तो है लेकिन किसी खास बीमारी का नहीं, बल्कि तकलीफ से तड़प रहे हर बीमार का. आइए इसे सरल तरीके से समझने की कोशिश करते हैं.

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हर मर्ज की कई दवाएं
होम्योपैथिक ट्रीटमेंट में रोग नहीं,

होम्योपैथी को लेकर भ्रम न पालें, पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें

होम्योपैथी को लेकर ढेरों मिथ (MYTHS) हैं – वजह जो भी हों आम लोगों में ये भ्रम व्याप्त है कि होम्योपैथी चिकित्सा में बड़े पेंच हैं. शायद, ये भी एक वजह है कि बहुत सारे लोग यूं ही होम्योपैथी से दूरी बनाए रखते हैं. आइए ऐसी ही कुछ बातों पर गौर करते हैं.

भ्रम: होम्योपैथिक दवाओं का असर धीरे धीरे होता है.

मीठी गोलियां कितनी कारगर – I

मीठी गोलियां कितनी कारगर हो सकती हैं? ये सवाल बहुत लोगों के मन में होता है कि मीठी गोलियों का भला कितना असर होगा? ऐसी आशंका स्वाभाविक है. जिस किसी ने भी होम्योपैथी को ठीक से समझा न हो – और न ही कभी तरीके से इलाज न कराया हो, उसके मन में धारणा तो ये रहेगी ही.

ऐसा तब भी हो सकता है जब आप किसी क्वालिफाइड प्रोफेशनल की बजाए किसी दोस्त,

जर्मन रेमेडीज ही क्यों, इंडियन क्यों नहीं?

आपने ध्यान दिया होगा अक्सर होम्योपैथिक फिजीशियन जर्मन रेमेडीज लेने की सलाह देते हैं. इंडियन दवाएं लेने की बात तब होती है जब महंगी जर्मन दवाएं लेना संभव न हो.
तो क्या इंडियन दवाएं ठीक नहीं होतीं. क्या इंडियन होम्योपैथिक रेमेडीज का असर नहीं होता. आइए एक वाकये से इसे समझने की कोशिश करते हैं.

घर में किसी को कुछ तकलीफ थी.

वर्ल्ड होम्योपैथिक डे – आज कुछ मीठा तो हो ही जाए

बनारस से हम लोग मडुवाडी-दिल्ली एक्सप्रेस में सवार हुए. हम दोनों की नीचे वाली बर्थ थी. ऊपर वाली दोनों बर्थ खाली थी. टीटीई ने बताया कि वो इलाहाबाद का कोटा है. हम लोग खा-पीकर सो गये.

आधी रात को कोटा पूरा होने का वक्त आ गया. जब हमारी नींद खुली तो दो लोग दिखे. एक आदमी सामान भी रख रहा था –

वर्ल्ड होम्योपैथिक डे की बधाई!

वर्ल्ड होम्योपैथिक डे की हैनिमन कैफे की ओर से बहुत बहुत बधाई. आपके जीवन में इतनी मिठास बनी रहे कि इलाज के लिए मीठी गोलियों की भी जरूरत न पड़े.[पूरा पढ़ें]



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